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वक्त में परिवार

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अभी मेट्रो से आ रहा था। एक दपन्ति जिनकी उम्र 20 से 25 के बीच रही होगी। उनके दो बच्चे थे। जिनमें डेढ़ या दो साल का अंतर रहा होगा। मेट्रो में मेरी सााइड वाली सीट पर बैठे थे। क्योंकि जेंडर का इतना  विमर्श पढ़ा है तो मन मे कई सवाल आ रहे थे। सवाल यूँ ही नहीं आ रहे थे वो चेहरे और चेहरे में घुमड़ रहे बादलों के बीच उनकी ज़िंदगी को टटोल रहे थे। पति पत्नी दोनों अपने अपने घरों में बड़े होते हुए, पिताओं के द्वारा ब्याह दिए गए। इतनी जल्दी विवाह के बाद दोनों पर समाज के दवाब रहे होंगे। फिर जवान होते लड़कों में सेक्स की जो समझ बनती है शायद उसमें बच्चे नही होते। लेकिन उसके बाद का परिणाम बच्चे होते है जो उनकी सोची समझी रणनीतिक तैयारी नही माना जाना चाहिए। अब बात ये है कि उन दो को शिशु से बालपन तक के लालन पालन की जिम्मेदारी का दबाव उस माँ पर होगा। इस बीच वो पिता बन चुका अल्हड़ किशोर भी शायद अपने पिता होने के सामाजिक दबावों को महसूस कर रहा होगा। दबाव इसलिए कह रहा हूँ लड़कियों की तरह सामाजिक जिम्मेदारी और दबावों को लेकर वो जन्म होते ही महसूस नही करते। मेट्रो में माँ थकान के साथ बैठी है। एक बच्चा प्लास्...

खुद में लौटते हुए

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बलदेव कृष्ण वैद्य का उपन्यास उसका बचपन पढ़ते पढ़ते अपने को उकेरता हूँ तो बचपन के उस हिस्से में लौटना चाहता हूँ जिस हिस्से का वक्त मैंने दोस्तों के साथ बिताया। अब यही हिस्सा है जिसमें बलदेव अपने उस बाल पात्र को परिवार की कहानी से नही निकालते। जब हमारे सांस्कृतिक परिवेश में बचपन बड़ों से बंधा हुआ होता है। तो उस बचपन को बचपन बनाये रखने में बाल मनोविज्ञान क्या करता है? वह शायद अपने आसपास उस पात्र की संरचना बनाने में लग जाता है जो उसके साथ उसकी तरह से जिये। जीने के इस क्रम में वो जो करीबी होता है उसे दोस्त की संज्ञा में अपने पास पाता है। यह जो मैं कह रहा हूँ शायद यह औसत पुरुष बालमन के बारे में कह रहा हूँ। दोस्त को मैं अपने बचपन का रचनात्मक सेल्फ(क्रिएटिव सेल्फ) मानता हूँ। जब घर वाले या स्कूल मुझे लगाम में बांधते थे तो मेरा यही सेल्फ मेरी लगाम में मेरे साथ भागता था। जैसे पढ़ाई या रोज रोज का होमवर्क मेरे से नही होता था तो मेरा दोस्त रोज रोज स्कूल पहुँचते ही हर आने वाले पीरियड या खाली वक्त में मेरी कॉपी के पन्नों को पलटता था। इस ज़िद में की किसी तरह मैं पिटाई से बच जाऊं। लेकिन मैं उसे इस माम...

अपने को लिखना है।

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अपने से गुजरते हुए अब सोच रहा हूँ लिखू। वैसे लिखना मेरे लिए असाध्य और असाधारण क्रिया रही है। लिखने का सबब होता भी था तो सोचता था कि अपने मन का लिखूं लेकिन अपने मन का न लिखने का प्रशिक्षण हमनें स्कूल में लिया और ये मुझमें कही रम गया है। खुद इस बीच सोचता हूँ कि अब बहुत पढ़ना हुआ, अब एक सिरे से लिखना भी होगा। इस दौरान इतना कुछ हो रहा है मेरा ना लिखना भी बेमानी है। लेकिन हाँ अपने लिखे को घसीटना नही है। इतने सारे संघर्ष बेजुबान मर रहे है। एक बेहतर देश जिसके सपने में सबको उतनी रोटी नसीब हो जितने भर की इच्छा मैं रखता हूं तो लिखना ही होगा। कितने लोग हमारे लिए खर्च होते जा रहे है कही बस चलाता ड्राइवर मुझे मेरी मंजिल पर सही वक्त पर पहुँचा रहा है, कही एक मजदूर रबड़ के जूते पहने हुए गर्म तालकोर का डिब्बा लिए हमारे चलने का रास्ता बना रहा है, कही किसान देर रात से खेत में पानी दे रहा है ताकि वो भूख हम तक न पहुँचें और भी पता नही कौन कौन हमें ज़िंदा रखने में अपने को खपाये हुए है। मामला अगर किसी के पास होने का और किसी के पास न होने का है तो फिर उन सबके लिए लिखना है। कई बार कई लेखों को पढ़ते हुए लगता ...
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नदी का कल - कल बहना नदी का पहाड़ों से उतरकर मैदान से होते हुए समंदर तक पहुँचना, नदी का अपना एक भूगोल है लेकिन नदी के इसी भूगोल को इंसान इतिहास बना देना चाहता है। नदी टेढ़े मेढ़े रास्तों से चलती है लेकर अपने भूगोल को, इसी भूगोल को इरादतन मनुष्य लगातार बदल रहा है। उसके भूगोल को बदलने के लिए बाँध बनाया। ये तो है कि उस पानी को खेतों तक पहुँचाया, ये तो है कि उससे बिजली बना घर ले आया, हम सब खुश तो होते है मनुष्य की इस विराटता को देखकर लेकिन ये उस नदी के खिलाफ साजिश थी। यह सब मनुष्य ने अपनी सभ्यता की/के उच्चता/ के विकास के लिए किया। यह सब मनुष्य ने अपने चरमसुख के लिए किया। उसके लिए सदियों से नदी सिर्फ अपने उपभोग का मामला भर है, लेकिन मनुष्य ने कभी नही सोचा उस नदी की सभ्यता के बारे में जिसे वो साथ - साथ लेकर बहती थी।  उसने सिर्फ उस नदी का उपभोग किया। ध्यान में रखने वाली बात यह है कि नदी स्त्रीलिंग है, और उसका एक भूगोल है, और मनुष्य आदतन अपने सुख के लिए इतिहास बना देगा। और सिर्फ वो जिनमें बची होगी मनुष्यता अपने बच्चों को सुनाया करेगें नदी की कहानियाँ। ...

होना

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होने की व्याख्या को जब करने की कोशिश कर रहा हूँ तो यह मुझे रोमांचित कर देता है. यह उन दिनों का होना भी है जब भरी गर्मी में अमलतास के फूल पिला रंग बिखेरे हुए होते है. यह उन दिनों का भी होना है जब दूब पर ओस की बूँद शिद्दत से लटकी हुई है. यह उन दिनों का होना भी है जब किसी सर्दी में जमी किसी नदी में पानी बह रहा होता है. यह उन दिनों का होना भी है जब मैं पहाड़ के उपर पहुँच कर हवा को अपने अंदर भर जाने की हद तक महसूस करता हूँ. वैसे दिल्ली में इस समय होना किसी गैस चैम्बर में होने से कम नहीं है. जिसमें मार्किट ने दिल्ली वालों का बता दिया है कि चिंता की कोई बात नहीं है हम आप को बचा ले जाएगे.  लेकिन फिर होने को महसूस किस तरह हो ही जाता है. यह होना मन का होना है. जिसे मैं  सूरते-बेहाल अपनी लूना के साथ महसूस करता हूँ. विश्वविद्यालय से निकलते हुए बंदरों के झुंड के पास उनको चिड़ा कर निकलते हुए.  सिविल लाइंस की तरफ जाते हुए उस रास्ते को महसूस करता हुआ कही एक प्याली चाय के साथ ढेर सारी बातों में मैं होता हूँ. थोडा आगे बढ़ते हुए फ्लाईओवर पर चढ़ते हुए दूसरे आसमान में छलांग लगाते हुए मैं ह...

एक क्षण एक जिंदगी

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कोई खगोलीय घटना नहीं हुई है।  इसलिए अंदर का टूटना मुझ तक ही सीमित होगा। अगर किस वस्तु  के परिप्रेक्ष्य में यह समझेगे तो यह एक दिन में निर्मित घटना नहीं है। यह अपरदन या अपक्षय की तरह लंबे समय में घट रही होती है।  जिसे भूगोल के किसी अध्याय में दो पृष्ठ में समेट कर समझा दिया गया है। पृथ्वी पर मेरा होना इतने बिन्दुओं के सापेक्ष बना हुआ है। जब मेरा होना किसी बिंदु पर रुका होता है तो उस से विचलन किस तरह होगा ? यह विचलन मेरे होने को कहा स्थिर करेगा, कहना मुश्किल है । मैं कई जगह होने को स्थित करके एक बिंदु पर अपने को देख रहा हूँ। मेरी सामाजिक और राजनितिक निर्मिति को लोग चुनौती देते रहते है।  मैं स्थानीय बिंदु पर खड़ा होकर एक बेहतर दुनिया होने की कल्पना में कई सिरे तलाश रहा हूँ।  ये जद्दोजहद शायद उस वक्त में दुगनी हो गयी है जब राज्य ने सुनियोजित तरह से सिर्फ कुछ लोगों के लिए दुनिया बेहतर बनाने को चुना है।  ऊपर बहुत कुछ  भाव वाचक में कहा गया है। एक कहानी  सुनाता हूँ। एक लड़का था।  एक नहीं दो लड़के थे. वो दोनों स्कूल में साथ साथ पढ़ते थे।  ...

एक थे चन्द्रपाल भाई

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                                                                बहुत दिनों से ब्लॉग पर लिख नहीं रहा हूँ. दिन क्या महीने हो गए है. मेरी एम.फिल के कारण भी मैंने और काम स्थगित कर रखे थे. दोबारा लिखने से पहले मैं तरतीब में आना चाहता था. शायद उसके कुच तो करीब हूँ. बहुत दिनों से दिन का कोई ऐसा समय जब मैं घर पर अकेला होऊंगा तो लिखना अपने आप होगा ही.  अब भी पास में पास में महाश्वेता की मास्स साब पड़ी है जिसको पढकर खत्म करना है. किन्द्ल में पैसेज टू इंडिया अधूरी पड़ी है. एक और किताब पढने को कोने में मेरा इंतजार कर रही है.  शायद लोगों से  रास्ता बनाना चाहता हूँ. क्यूँ के सभी सवालों का जवाब भी उन्हीं को बारी बरि से दूंगा, जब वो कभी जवाब मांगेगे.  उपर लिखी पंक्तियाँ अभी इसलिए लिख गया कि अगर मेरी जिंदगी में दूसरी तरफ़ कुछ हो रहा होगा तो क्या ही हो रहा होगा. मुझे नहीं पता. फ़ोन पर घर वालों से कम ही बात करता हूँ. भाई...

सपने और उम्मीदें

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आम दिनों की तरह सोमवार मेरे लिए  जद्दोजहद से शुरू होता है. बहुत तेज़ नींद आई हुई थी लेकिन सुबह उठ गया एक तो माँ और पिताजी आये हुए थे. दूसरा कक्षा के लिए पढना था. खाना खाने के बाद निकला। कक्षा में पंहुचा। पढाई शुरू की।   मैं अपनी कक्षा को प्रश्नों में ढूँढता हूँ. उसमे कई बार गडबडा भी जाता हूँ.पीपीटी होने के बाद भी में संवाद पसंद करता हूँ. मेरे लिए फरवरी का आख़िरी हफ्ता अजीब सा ही होता है. इस बीच दिमाग में कई कामों की तैयारी चल रही थी. कोरिडोर से स्टाफ रूम में जा रहा था तो मेरी कुछ छात्राओं ने रोककर पूछा की क्या मुझे रामजस वाली घटना का पता है. मैंने कहा हाँ. तो उन्होंने अपना पक्ष बताना शुरू किया वो रामजस वाली घटना से नाराज थी. उन्होंने बताया भी की वो भी रामजस में हुई छात्र संगठन की हरकत से नाराज़ है. इसके साथ ही उन्होंने बताया की विरोध प्रदर्शन भयावह था. वहां abvp के साथ आये  लड़के गलियाँ दे रहे थे  और गलत गलत इशारे भी कर रहे थे. लउन्होंने कहा की वो उनकी हरकतों से दरी नहीं बल्कि आक्रोशित हुई. उनके बहुत से सवाल और बातें थी. मैं पिछले एक साल से सोच रहा था की रोहित वेमुल...

अपने अंदर के क्लासरूम में

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ये मेरा कॉलेज में दूसरा साल पूरा हुआ है। पहले साल से ज़्यादा उलझा-सुलझा महसूस करता हूँ. अपने  स्कूल टाइम में  भी कुछ समझ नहीं आता था मुझे।  आसानी से अपने सब्जेक्ट से निकल जाता था। जहाँ रुकता था शायद वो मेरे लिए सपनों की दुनिया होती थी. मेरा हिंदी का सब्जेक्टजिसकों अक्सर मैं घण्टों घण्टों पढ़ता था। मेरी इतिहास की किताबें और मेरी नागरिक शास्त्र की किताब। मुझे उनसे बहुत प्यार था  और है भी। अपनी तरह का इंसान हूँ जितना समझ आता था उसमें खुश होता था लेकिन आसपास के दबाव ने लगातार कमजोर बना दिया। ज़िन्दगी में एक अच्छी बात ये रही की दोस्त ज़िन्दगी से अच्छे मिले. तो अपने दिमाग से जूझते, लड़तें, झगड़ते जितना सीखा उसमें मुझे शक रहता था.वैसे ये क्यूँ लिख रहा हूँ मैं मुझे नहीं पता। लेकिन हाँ मुझे पता है की मैं ये क्यूँ लिख रहा हूँ। अब मैं एक शिक्षक हूँ। हमारे समाज में शिक्षक  की एक इमेज है,वो है नैतिक भार। लेकिन इस नैतिक भार को नहीं उठाये फिरता।  लेकिन अपनी कक्षा में खड़ा होता हूँ तो अपने शब्दों को लेकर सोचता हूँ की क्या कह रहा हूँ। अब कक्षा में पहले से ज़्यादा ध्यान से बात...

ये वक्त

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                                                                                                                                                                                                                                                                                             ...

जुगनुओं के सवाल

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हम जो आज वर्तमान में खड़े होकर कही भविष्य में देखते है। ये खिड़की बहुत पसन्द है। आज सामने वही सवाल था, जिसका जवाब, सर से अभी तक नही मिला। मेरे सामने वो सवाल आया तो मैंने क्या किया ? कुछ नहीं किया। उलटे मैंने उनके सवाल को अपने कैनवास पर उतार लिया और कहा, देखो ये दुनिया है। हमें इस दुनिया में आशा बनाये रखनी होगी। वैसे मैं छुपना नहीं चाहता। लेकिन सामने आने पर मार दिए जाने का खतरा है। लेकिन इस बदलती दुनिया में हम देखेगे वो दिन के जिस का वादा है।  इस पंक्ति से मैं वादाखिलाफी नहीं करूँगा। बहुत खुश हूँ मैं। इस दौर में जब एक साथ इतनी घटनाएं घट रही है तो मुझे बैचैनी तो है। क्योंकि अभिव्यक्ति के सारे खतरे उठाने होंगे। जब मैं इस वक़्त खुद से बहुत नाराज़ हूँ तो मेरी जुगुनुए ही है जो सवाल पुछती रहती हैं। इन जुगनुओं के सवाल हैं।  (पोस्ट अधूरी है। सवाल की तरह ही कभी इसके और हिस्से किश्तों में आते रहेंगे।)

शहर का दिया

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हमनें शहरों को ट्यूबलाइट से भर लिया वक़्त ने शहर से धीरे धीरेआसमां के तारे खोये, शहरों ने हमारे दिन रात हम लोगों से छीने तब से नींद में मिलते है एक-दूसरे से लोग,     शहर ने बिना धूल वाले कंक्रीट के रास्तें दिए शायद ही हमें कोई पगडण्डी मिली हो शहर में, शहरों ने जगह दी रहने को, हमें लोग दिए सुना है गाँव में बहुतेरे घर खाली पड़े है अब, शहरों ने हमें तरीके दिए कई जीने के फिर हम भूलने लग गए एक दूसरे को, शहर ने हमें दुनिया में काम करना सिखाया इंसानियत को भूलकर हमनें ये काम सीख लिये कभी शहर मेरे लिए सपना सरीखे थे फिर भी गाँव ही लौट जाना चाहता हूँ,

सवाल पूछना है

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कई दिनों से  एक सवाल सामने रहता है। लेकिन इसको पूछा क्यों जाए? और न पूछना भी तो सवाल के साथ जीना दुश्वार कर देता है।अगर जवाब के घर का पता  होता तो अपने सवाल को चीठ्ठी के जरिये जरूर पंहुचा देता। लेकिन ऐसे थोड़े होता हैं जवाब की एक दुनिया होगी। फिर मैं क्यों उस जवाब को अपने सवाल के इल्म की दुहाई दू। ये भी तो है इस सवाल के साथ बहुत कुछ कहना था फिर सवाल और फिर कहना दोनों नहीं हो पाता। सवाल के साथ मैं लाइब्रेरी में घंटो बिताता भी हूँ तो भी सूरत-ऐ -हाल वही रहता। जबाब परेशान है इसलिए तंग करना भी ठीक नही पर कोई बात चले तो जा पहुचे गी  ग़ालिब की हवेली तक। वैसे भी आजकल कोई बैठकर शांति से बात कहा करता है। ये सवाल शायद मेरा कृष्णा सोबती की ऐ लड़की से है जो अभी पढ़नी बाकी है। यु भी सवाल के बहाने लिखना हो गया। वरना आजकल बस सोचना ही हो रहा है लिखना नहीं हो पा रहा।

वो अँधेरी दुनिया चाहते है

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वो लड़ रहे है वो झगड़ रहे है  ये करना उनकी दिनचर्या का हिस्सा भी नहीं होगा  फिर भी वो लड़-झगड़ रहे है    क्यूँ वो एक दूसरे को अपनी पहचान देना चाहते है  जब उनकी जीभ का स्वाद अलग है  जब उनकों स्पंदन भी अपनी तरह का महसूस होता है  जब सब कुछ वो अपनी तरह का करना चाहते है  तो  शायद उन्हें पता होगा की दुनिया में रंग है  अब उन्होंने क्यों इस दुनिया बैरंग करना चाहते है अनंत बिंदु से इस दुनिया ने अपने को सबके हिस्से का गढ़ा है  फिर वो क्यूँ  चाह रहे है की सब उन/उस जैसे हो जाए  आखिर अपने स्वार्थों की खानापूर्ति का ये खेल क्यूँ   उन्हें सब रंगों को मानना होगा वरना एक दिन सिर्फ अँधेरा होगा घोर अँधेरा  फिर शायद खुश हो जाए  मिट जाएगी इंसानी पहचाने पहचानने के लिए सिर्फ बचा रह जायेगा अंधेरा  

माफीनामा बायीं तरफ दर्ज है

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पूरा दिन यूँ ही निकल जाता है। सामने कई किताबें बिखरी है। क्रांति अब मेरे लिए मूकदर्शक है। पढ़ना जैसे कमरे में लगा मकड़ी का जाला हो गया है जिस पर धुल जम चुकी है। आजकल अपने पीछे एक ही समय में दो हाथों के सहारे अपने कान और आँखे बंद करके खड़ा हूँ।क्या पगडंडी तुम्हारी बनाई हुई है ? इस पर चलुंगा तो मुझे पता है तुमने चलने के लिए पक्की गली चुनी है। अपने में लौटने का इंतजार कर रहा वो शख़्स सिर्फ एक मूर्ति है जिसे इतिहासकार किसी संग्रहालय में ढूंढ के रखेंगे। पता नही उसे वो देख पाएंगे जिनके लिए वो आशान्वित है की एक दिन उसे वो देखेंगे। कुछ दिन के लिए समय हम में बीतना चाहता था तो फिर बीत गया तो उसकी स्मृति रेखाएँ भी हाथ में नही पढ़नी चाहिए। वैसे समंदर किनारे रेत में लेट जाने का मन होता है जब ज्वार चढ़ेगा तो मैं उसमे उतर जाऊंगा। फिर अनंतकाल तक उस मछली की आँखों में झाँकूँगा जिसमे इंसानी दुनिया नहीं होगी। भूगोल का छात्र होते हुए भी कहना चाहता हूँ की मैं पृथ्वी के किनारे -किनारे चलना चाहता हूँ। चलना भी एक रवायत है समंदर से लहरे लगातार चल कर आती है और किनारे पर आकर टूट जाती ...

शहर में क्या होंगे हम तुम

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चलों न साथ साथ चलते है इन सड़कों पर  इस शहर में एक दूसरे को ढूंढेगे हम दोनों हो जाएंगे बस स्टैण्ड का इंतजार किसी खाली बस में घर तक पहुंचेंगे  हम उस पानी वाले का पानी हो जाएंगे  जो ठण्डा रहता है घंटों और प्यास किसी की बुझाता है  हम किसी रिक्शा खींचने वाले का पसीना बनकर बहेंगे  जो शाम को ढ़ाबे पर रोटी के स्वाद बदलता है  हम यूनिवर्सिटी की वो बेस्वाद चाय हो जाएंगे जिस को दिल्लगी के चलते पीते है  तुम कमला नगर हो शायद और मैं मुखर्जी नगर तुमसे दिल नहीं भरता और मैं वहा ठहरा हूँ कई सालों से         देखो  शहर रोज बदल रहा है.........   संदीप 'विहान'

और मेरा पहला साल

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दिल्ली में अपनी अलग सी पहचान लिए हुए एक इमारत ने 1948 से अब तक बहुत कुछ गढ़ा है। इस इमारत की खास बात यह है की इसकी ईटे वही से नजर आनी शुरू हो जाती है जहाँ से धरती की सतह शुरू होती है ।मतलब इसकी मजबूती  जमीं से जुडी  है। ये इमारत बड़ी प्रखर है, बातूनी है, लड़ती है, झगड़ती है, मचलती है, सँवरती है और भी न जाने क्या क्या । यह इमारत जीती जागती स्त्री है ।इस इमारत का नाम मिरांडा हाउस है। यहाँ एक साल हो गया। अच्छा लगता है लड़कियाँ दुनिया रच रही है। जिन को आदमी द्वारा दुनिया आगे बढ़ाने का मुगालता है वो अपने पास रखिये। पिछले साल की जनवरी को याद करता हूँ  तो याद आता है की दो औरतों को पढ़ते-पढ़ते मैं उनकी दुनिया में पहुँच जाऊँगा, इस को सोचना बहुत रूमानी है। एक उमा चक्रवर्ती हैं, जिनकी किताब 'जाति में पितृसत्ता' उस दौरान पढ़ के खत्म ही की थी और दूसरी प्रेम चौधरी जिन्होंने 'घूंघट वाली औरतों' की दुनिया को समझाया। वैसे सोचता हूँ मनु भंडारी ने इसी कॉलेज में 'नई नौकरी' कहानी ताना-बाना बुना होगा। नंदिता दास ने इसी कॉलेज में अभिनय के कुछ...

विकास का रंगमंच

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''  मैं सोचने पर मजबूर की हम सब क्या अच्छे और बुरे पीआर के शिकार भर है ? '' इस पंक्ति के जरिये घर से लेकर बाहर तक जो हो रहा है ,या फिर देश से विदेश तक जो हो रहा है उसे देखने की  कोशिश कर रहा हूँ। लेकिन शांत रहने की कवायद में मैं निर्जीव होता जा रहा हूँ। लेकिन निर्विकार नही हो सकता ,क्यूंकि हाड़-माँस का बना हुआ जीव हूँ और वैज्ञानिक भाषा में इस हाड़ माँस के पुतले को होमो सॅपिएन्स कहते है। मैं चाहता हूँ की मैं भी निर्विकार होकर रहने का दैवत्व प्राप्त करू। फिर इसमें भी तो डर हैं की इसी निर्विकार के चलते सभी लड़ाइयाँ और शांति अपने स्थापित मूल्यों में पहुँची हैं जिसे  ईश्वर कहते है। अगर मैं सोचूँ और अपने को इस मैट्रिक्स से बाहर निकालूँ तो मैं घृणा विहीन या स्पन्दनहीन दुनिया की कल्पना करुगाँ। जिसमें जो हो रहा हो उसका आरोप दूसरे पर ना मढ़े।  खालसा से मेरे कमरे तक रस्ता इस शहर के बारे में सोचने को मजबूर कर देता है।मुझे तो ये ही समझ नही आता की कर क्या रहे हैं ? हम अपने साथ !!! और जो कर रहे हैं उसमे स्त्री और पुरुष बराबर के ...

ख़ालिस शहर........

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शुरुआत कहा से हो मैं नही जानता।शहर मेरे लिए लगातार अजीब होता जा रहा है। इसमें मैं हवा के अक्स को ढूंढने की कोशिश में ही लगा रहता हूँ। शहर आपको एक अजीब तरह की अव्यवस्था की तरफ धकेलते है। जो लोग इस शहर को अपना लेते है वो इसको सच्चाई मान लेते है।सच्चाई शहर के व्यवस्थित मान लेने की है। जैसे ही व्यवस्थित कहा तो लगातार शहर कंक्रीट और लोहे में तब्दील दिखाई देने लगता है।चारों तरफ़ नजर दौड़ाने पर एक भीड़ सामने नजर आती है वो भीड़ है इंसानों की, मकानों की, दुकानों की और बंद गलियों की।लगातार शहर अपने में कैद हो रहे है और ये हमारे लिए डेवलपमेंट है। हम लगातार अपने अगल-बगल में झाँक रहे होते है और सोचते है मेरा डेवलपमेंट इस से कम कैसे है। इस क्षीण भाव से शहर हमें भीड़ में धकेलता है। शहर में बचे रहने की सम्भावना के लिए हमनें पार्क,मार्केट,मॉल और भी कई कोने ढूंढ लिए है। अपने को पीठ पर लादे हुए इधर से उधर घूमना शहर में रवायत है। मिल जाने की सम्भावना के साथ ही तो हम लगातार इन शहरों में अपने से जूझ रहे है। आप कभी फ्लाईओवर पर खड़े होइए और देखिये शहर को फिर सोचिए क्यूँ दिल फ्लाईअवे...

संजीदा से ख्वाब

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मेरा ख्वाब क्या है , पहाड़ की तलहटी , नदी को सुबह जाकर बहते सुनना , रात को चाँदनी रात में बर्फ वाला पहाड़ निहारना, पहाड़ की गुफा के किनारे लगा फ़ूस का बिस्तर , नदी किनारे सुबह-सुबह पानी में पैर डालकर  दुष्यंत की कविताएँ पढ़ू .........  और हाँ रात में किसी बर्फ पहाड़ी रास्ते में बिस्तर बिछाकर  ये गुनगुनाना.   पेड़—पौधे हैं बहुत बौने तुम्हारे                                                                                      रास्तों में एक भी बरगद नहीं।                                                                                ...