विकास का रंगमंच
'' मैं सोचने पर मजबूर की हम सब क्या अच्छे और बुरे पीआर के शिकार भर है ? '' इस पंक्ति के जरिये घर से लेकर बाहर तक जो हो रहा है ,या फिर देश से विदेश तक जो हो रहा है उसे देखने की कोशिश कर रहा हूँ। लेकिन शांत रहने की कवायद में मैं निर्जीव होता जा रहा हूँ। लेकिन निर्विकार नही हो सकता ,क्यूंकि हाड़-माँस का बना हुआ जीव हूँ और वैज्ञानिक भाषा में इस हाड़ माँस के पुतले को होमो सॅपिएन्स कहते है। मैं चाहता हूँ की मैं भी निर्विकार होकर रहने का दैवत्व प्राप्त करू। फिर इसमें भी तो डर हैं की इसी निर्विकार के चलते सभी लड़ाइयाँ और शांति अपने स्थापित मूल्यों में पहुँची हैं जिसे ईश्वर कहते है। अगर मैं सोचूँ और अपने को इस मैट्रिक्स से बाहर निकालूँ तो मैं घृणा विहीन या स्पन्दनहीन दुनिया की कल्पना करुगाँ। जिसमें जो हो रहा हो उसका आरोप दूसरे पर ना मढ़े। खालसा से मेरे कमरे तक रस्ता इस शहर के बारे में सोचने को मजबूर कर देता है।मुझे तो ये ही समझ नही आता की कर क्या रहे हैं ? हम अपने साथ !!! और जो कर रहे हैं उसमे स्त्री और पुरुष बराबर के ...