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माफीनामा बायीं तरफ दर्ज है

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पूरा दिन यूँ ही निकल जाता है। सामने कई किताबें बिखरी है। क्रांति अब मेरे लिए मूकदर्शक है। पढ़ना जैसे कमरे में लगा मकड़ी का जाला हो गया है जिस पर धुल जम चुकी है। आजकल अपने पीछे एक ही समय में दो हाथों के सहारे अपने कान और आँखे बंद करके खड़ा हूँ।क्या पगडंडी तुम्हारी बनाई हुई है ? इस पर चलुंगा तो मुझे पता है तुमने चलने के लिए पक्की गली चुनी है। अपने में लौटने का इंतजार कर रहा वो शख़्स सिर्फ एक मूर्ति है जिसे इतिहासकार किसी संग्रहालय में ढूंढ के रखेंगे। पता नही उसे वो देख पाएंगे जिनके लिए वो आशान्वित है की एक दिन उसे वो देखेंगे। कुछ दिन के लिए समय हम में बीतना चाहता था तो फिर बीत गया तो उसकी स्मृति रेखाएँ भी हाथ में नही पढ़नी चाहिए। वैसे समंदर किनारे रेत में लेट जाने का मन होता है जब ज्वार चढ़ेगा तो मैं उसमे उतर जाऊंगा। फिर अनंतकाल तक उस मछली की आँखों में झाँकूँगा जिसमे इंसानी दुनिया नहीं होगी। भूगोल का छात्र होते हुए भी कहना चाहता हूँ की मैं पृथ्वी के किनारे -किनारे चलना चाहता हूँ। चलना भी एक रवायत है समंदर से लहरे लगातार चल कर आती है और किनारे पर आकर टूट जाती ...

शहर में क्या होंगे हम तुम

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चलों न साथ साथ चलते है इन सड़कों पर  इस शहर में एक दूसरे को ढूंढेगे हम दोनों हो जाएंगे बस स्टैण्ड का इंतजार किसी खाली बस में घर तक पहुंचेंगे  हम उस पानी वाले का पानी हो जाएंगे  जो ठण्डा रहता है घंटों और प्यास किसी की बुझाता है  हम किसी रिक्शा खींचने वाले का पसीना बनकर बहेंगे  जो शाम को ढ़ाबे पर रोटी के स्वाद बदलता है  हम यूनिवर्सिटी की वो बेस्वाद चाय हो जाएंगे जिस को दिल्लगी के चलते पीते है  तुम कमला नगर हो शायद और मैं मुखर्जी नगर तुमसे दिल नहीं भरता और मैं वहा ठहरा हूँ कई सालों से         देखो  शहर रोज बदल रहा है.........   संदीप 'विहान'

और मेरा पहला साल

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दिल्ली में अपनी अलग सी पहचान लिए हुए एक इमारत ने 1948 से अब तक बहुत कुछ गढ़ा है। इस इमारत की खास बात यह है की इसकी ईटे वही से नजर आनी शुरू हो जाती है जहाँ से धरती की सतह शुरू होती है ।मतलब इसकी मजबूती  जमीं से जुडी  है। ये इमारत बड़ी प्रखर है, बातूनी है, लड़ती है, झगड़ती है, मचलती है, सँवरती है और भी न जाने क्या क्या । यह इमारत जीती जागती स्त्री है ।इस इमारत का नाम मिरांडा हाउस है। यहाँ एक साल हो गया। अच्छा लगता है लड़कियाँ दुनिया रच रही है। जिन को आदमी द्वारा दुनिया आगे बढ़ाने का मुगालता है वो अपने पास रखिये। पिछले साल की जनवरी को याद करता हूँ  तो याद आता है की दो औरतों को पढ़ते-पढ़ते मैं उनकी दुनिया में पहुँच जाऊँगा, इस को सोचना बहुत रूमानी है। एक उमा चक्रवर्ती हैं, जिनकी किताब 'जाति में पितृसत्ता' उस दौरान पढ़ के खत्म ही की थी और दूसरी प्रेम चौधरी जिन्होंने 'घूंघट वाली औरतों' की दुनिया को समझाया। वैसे सोचता हूँ मनु भंडारी ने इसी कॉलेज में 'नई नौकरी' कहानी ताना-बाना बुना होगा। नंदिता दास ने इसी कॉलेज में अभिनय के कुछ...

विकास का रंगमंच

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''  मैं सोचने पर मजबूर की हम सब क्या अच्छे और बुरे पीआर के शिकार भर है ? '' इस पंक्ति के जरिये घर से लेकर बाहर तक जो हो रहा है ,या फिर देश से विदेश तक जो हो रहा है उसे देखने की  कोशिश कर रहा हूँ। लेकिन शांत रहने की कवायद में मैं निर्जीव होता जा रहा हूँ। लेकिन निर्विकार नही हो सकता ,क्यूंकि हाड़-माँस का बना हुआ जीव हूँ और वैज्ञानिक भाषा में इस हाड़ माँस के पुतले को होमो सॅपिएन्स कहते है। मैं चाहता हूँ की मैं भी निर्विकार होकर रहने का दैवत्व प्राप्त करू। फिर इसमें भी तो डर हैं की इसी निर्विकार के चलते सभी लड़ाइयाँ और शांति अपने स्थापित मूल्यों में पहुँची हैं जिसे  ईश्वर कहते है। अगर मैं सोचूँ और अपने को इस मैट्रिक्स से बाहर निकालूँ तो मैं घृणा विहीन या स्पन्दनहीन दुनिया की कल्पना करुगाँ। जिसमें जो हो रहा हो उसका आरोप दूसरे पर ना मढ़े।  खालसा से मेरे कमरे तक रस्ता इस शहर के बारे में सोचने को मजबूर कर देता है।मुझे तो ये ही समझ नही आता की कर क्या रहे हैं ? हम अपने साथ !!! और जो कर रहे हैं उसमे स्त्री और पुरुष बराबर के ...

ख़ालिस शहर........

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शुरुआत कहा से हो मैं नही जानता।शहर मेरे लिए लगातार अजीब होता जा रहा है। इसमें मैं हवा के अक्स को ढूंढने की कोशिश में ही लगा रहता हूँ। शहर आपको एक अजीब तरह की अव्यवस्था की तरफ धकेलते है। जो लोग इस शहर को अपना लेते है वो इसको सच्चाई मान लेते है।सच्चाई शहर के व्यवस्थित मान लेने की है। जैसे ही व्यवस्थित कहा तो लगातार शहर कंक्रीट और लोहे में तब्दील दिखाई देने लगता है।चारों तरफ़ नजर दौड़ाने पर एक भीड़ सामने नजर आती है वो भीड़ है इंसानों की, मकानों की, दुकानों की और बंद गलियों की।लगातार शहर अपने में कैद हो रहे है और ये हमारे लिए डेवलपमेंट है। हम लगातार अपने अगल-बगल में झाँक रहे होते है और सोचते है मेरा डेवलपमेंट इस से कम कैसे है। इस क्षीण भाव से शहर हमें भीड़ में धकेलता है। शहर में बचे रहने की सम्भावना के लिए हमनें पार्क,मार्केट,मॉल और भी कई कोने ढूंढ लिए है। अपने को पीठ पर लादे हुए इधर से उधर घूमना शहर में रवायत है। मिल जाने की सम्भावना के साथ ही तो हम लगातार इन शहरों में अपने से जूझ रहे है। आप कभी फ्लाईओवर पर खड़े होइए और देखिये शहर को फिर सोचिए क्यूँ दिल फ्लाईअवे...

संजीदा से ख्वाब

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मेरा ख्वाब क्या है , पहाड़ की तलहटी , नदी को सुबह जाकर बहते सुनना , रात को चाँदनी रात में बर्फ वाला पहाड़ निहारना, पहाड़ की गुफा के किनारे लगा फ़ूस का बिस्तर , नदी किनारे सुबह-सुबह पानी में पैर डालकर  दुष्यंत की कविताएँ पढ़ू .........  और हाँ रात में किसी बर्फ पहाड़ी रास्ते में बिस्तर बिछाकर  ये गुनगुनाना.   पेड़—पौधे हैं बहुत बौने तुम्हारे                                                                                      रास्तों में एक भी बरगद नहीं।                                                                                ...

अश्लील समाज की औरतें

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हाथ में आधे हाथ का आधा शादी का चूड़ा पहने जाती औरत, चाय की दुकान के सामने खुले स्नानागार में सहजता से नहा रही औरत , सुबह-सुबह दो बैग लेकर कंधे पर उचकाती  जाती औरत, स्कूल की तरफ जाते हुए पानी की बोतल से पानी पीती लड़की , कपड़ों की गठरी को लेकर जल्दी से दुकान की तरफ भागती औरत , सुबह सुबह सूर्य को जल अर्ध्य देकर मनाती औरत, उम्र के शायद सतहरवें पड़ाव पर पार्क में बैठी मुँह में कुछ बुदबुदाती वो औरत, घर के बाहर झाड़ू निकालती धूल धूसरित वो औरत, सब सामान्य तो नजर आ रहा है सुबह में , माफ़ कीजियेगा ये अश्लील समाज की औरतें है जो खुद तो कुछ कहती नजर नहीं आ रही किसी को, लेकिन अश्लील समाज इन्हें लील रहा है । इस कविता को सुबह 6 बजे की चाय पीकर आने के बाद लिखा। यह भी नही पता की क्यूँ लिखा । मुझे अंतिम  पंक्ति भी ठीक नही लग रही। लेकिन जिस तरह ये बुनी है, वो आपके लिए मेरे लिए है। और हाँ मैं भी वही घृणित समाज हूँ, कोई और नही। मेरी वैचारिक प्रतिस्पर्धा मेरे से ही है। अजीब कशमकश है गद्य क्यूँ नही लिख पाता। इस सवाल को जरूर ढूंढूगा।