Monday, February 27, 2017

सपने और उम्मीदें


आम दिनों की तरह सोमवार मेरे लिए  जद्दोजहद से शुरू होता है. बहुत तेज़ नींद आई हुई थी लेकिन सुबह उठ गया एक तो माँ और पिताजी आये हुए थे. दूसरा कक्षा के लिए पढना था. खाना खाने के बाद निकला। कक्षा में पंहुचा। पढाई शुरू की।  
मैं अपनी कक्षा को प्रश्नों में ढूँढता हूँ. उसमे कई बार गडबडा भी जाता हूँ.पीपीटी होने के बाद भी में संवाद पसंद करता हूँ. मेरे लिए फरवरी का आख़िरी हफ्ता अजीब सा ही होता है. इस बीच दिमाग में कई कामों की तैयारी चल रही थी. कोरिडोर से स्टाफ रूम में जा रहा था तो मेरी कुछ छात्राओं ने रोककर पूछा की क्या मुझे रामजस वाली घटना का पता है. मैंने कहा हाँ. तो उन्होंने अपना पक्ष बताना शुरू किया वो रामजस वाली घटना से नाराज थी. उन्होंने बताया भी की वो भी रामजस में हुई छात्र संगठन की हरकत से नाराज़ है. इसके साथ ही उन्होंने बताया की विरोध प्रदर्शन भयावह था. वहां abvp के साथ आये  लड़के गलियाँ दे रहे थे  और गलत गलत इशारे भी कर रहे थे. लउन्होंने कहा की वो उनकी हरकतों से दरी नहीं बल्कि आक्रोशित हुई. उनके बहुत से सवाल और बातें थी. मैं पिछले एक साल से सोच रहा था की रोहित वेमुला और जेएनयु की घटना पर अपनी छात्राओं का विरोध नहीं दिखा लेकिन आज लगा की घटनाओं को सब समझ रहे है. एकतरफा मीडिया की रिपोर्टिंग को भी वो समझ रही है. 

 मैं अपने शिक्षक जीवन में किसी विचारधारा के पक्ष में अपनी छात्राओं को को नहीं कहता। मेरा मानना है वो बेहतर चुनेगी। उनकी कल्पनाओं का भारत वो समझ रही होगी. लेकिन एक लड़के की अपेक्षा उनके सामने परिवार के दबाव ज़्यादा है लेकिन फिर भी वो चीजों से लड़ झगड़  रही है. घर में माँ बाप कहते है की राजनीति से दूर रहो।  लेकिन वो राजनीति  में हिस्सा ले रही है. विविधताओं के भारत को शायद वो समझ रही है. मुझे लगता था ना की व्यवस्था की क्रूरता से ऊब कर  हम अपना देश हार बैठेगें  लेकिन मैं गलत हूँ।  सही के पक्ष में खड़ें होने वाले आते रहते है. 
लेकिन शिक्षक होने के नाते डर भी लगता है उनको कोई नुकसान न पहुचें। और ये मैं सब इस लिए नहीं लिख रहा की उनकी समझ मेरी समझ से मेल खा रही है. ये इसलिए लिख रहा हूँ की विचारों से लैस सहमत और असहमत  बातों पर चर्चा होनी चाहिए. लेकिन हिंसा कतई नहीं। 

 आखरी पंक्ति में ये ही लिखूंगा ' लड़कियों कमाल हो तुम जहाँ जैसे भी अन्याय और असहमति हो संवाद और लोकतंत्र के लिए डटे रहना।  ये कविता  उम्मीदों और सपनों के लिए - पुलिस की लाठी सबसे खतरनाक नहीं होती। 


Monday, January 30, 2017

अपने अंदर के क्लासरूम में

ये मेरा कॉलेज में दूसरा साल पूरा हुआ है। पहले साल से ज़्यादा उलझा-सुलझा महसूस करता हूँ. अपने  स्कूल टाइम में  भी कुछ समझ नहीं आता था मुझे।  आसानी से अपने सब्जेक्ट से निकल जाता था। जहाँ रुकता था शायद वो मेरे लिए सपनों की दुनिया होती थी. मेरा हिंदी का सब्जेक्टजिसकों अक्सर मैं घण्टों घण्टों पढ़ता था। मेरी इतिहास की किताबें और मेरी नागरिक शास्त्र की किताब। मुझे उनसे बहुत प्यार था  और है भी। अपनी तरह का इंसान हूँ जितना समझ आता था उसमें खुश होता था लेकिन आसपास के दबाव ने लगातार कमजोर बना दिया। ज़िन्दगी में एक अच्छी बात ये रही की दोस्त ज़िन्दगी से अच्छे मिले. तो अपने दिमाग से जूझते, लड़तें, झगड़ते जितना सीखा उसमें मुझे शक रहता था.वैसे ये क्यूँ लिख रहा हूँ मैं मुझे नहीं पता। लेकिन हाँ मुझे पता है की मैं ये क्यूँ लिख रहा हूँ। अब मैं एक शिक्षक हूँ। हमारे समाज में शिक्षक  की एक इमेज है,वो है नैतिक भार। लेकिन इस नैतिक भार को नहीं उठाये फिरता।  लेकिन अपनी कक्षा में खड़ा होता हूँ तो अपने शब्दों को लेकर सोचता हूँ की क्या कह रहा हूँ। अब कक्षा में पहले से ज़्यादा ध्यान से बातों को सुनता हूँ। लेकिन जवाब का क्या करू। हर बार पहली बार से मुश्किल होता है किसी सवाल का जवाब देना। मुझे लगता है अपने से एक चीज़ मैंने सीखा है की जब तक जोड़ेगें नहीं तब तक छोड़ेंगे नही। डर लगता था मुझे स्कूल से। मुझे स्कूल के बाद की बेपरवाह धुप अच्छी लगती थी. मुझे याद है मुझे और मेरे दोस्त को कितना मजा आता था धुप में। 

 वो क्या है की मन में लगता है कुछ अधूरा ना छोड़ दूँ। इसलिए दिमाग में कोशिशों की उम्मीद ज़िंदा रहती है। इस दुनिया को देखने की नजरें  हम एक साथ पैदा करे। इसी के साथ मैं अपनी छात्राओं के साथ कक्षा  हूँ। अभी बनता हुआ क्षण हूँ मैं। और मैं ही नहीं हम सब बनते हुए क्षण है।

  हमारे यहाँ  तीसरे साल के पिछले बैच को मैंने पूरे साल पढ़ाया। मैं कक्षा में बताने नहीं जाता उलझाने जाता हूँ। सोचता हूँ सीधे-सीधे बताकर क्लास पूरी कर लूँ।  लेकिन  नहीं वो क्या है ना मन नहीं मानता। क्लास को मैं जहाँ से लेकर चलता हूँ  उनके दूसरी जगह लेकर खड़ा होता हूँ। इसलिए छात्राएं  मेरी क्लास से ज़्यादातर खफा भी रहती थी। कइयों ने बार बार आकर कहा भी की आप की क्लास में कुछ समझ सा नहीं आता। कक्षा का कोई निष्कर्ष नहीं होता।  पहली बार मैं डर गया कि अब क्या करू। फिर मैं अपने सपनो में जाकर अपनी कक्षा को बनाता हूँ।  ये मेरी पाठ  योजनाएं है। लेकिन सच में निष्कर्ष वाली कक्षा तो मैं  बिलकुल नहीं चाहता। मुझे ये भी पता है मेरे विषय में दोहराव बहुत है। लेकिन अभी सीखना बाकी है। 
 और हाँ आदत से मजबूर हूँ तो कक्षायी प्रयोग करता रहता हूँ। ये डॉक्यूमेंट्री का भूत मुझ पर सवार रहता है। पिछले साल बनवाई थी कुछ। सारी ही अच्छी थी। लेकिन एक समस्या थी की ग्रुप में हमेशा  कोई न कोई समस्या रहती थी। इस बार सोचा की अपनी अपनी सहूलियतों से लोग ग्रुप बना ले.इसमें तो शायद और दिक्कत आयी। लिखने एक तरह का रिवाज़ सा बन गया है। इसको तोड़ने के लिए इस विचार का प्रयोग किया गया था। एक  छात्रा  ने बताया भी की अनिल सदगोपाल सर से बात कर के मजा आया। अनिल सर का जमीनी स्तर पर बहुत काम है। कम से कम इस बहाने वो लोगों से मिल तो रहे है। कुछ तो सीख ही रहे होगें।
पता नही कितना सीख पाया और समझा पाया। लेकिन हाँ सीखने को जो मिल रहा है वो दर्ज हो रहा है दिमाग में. इस साल शिक्षक प्रशिक्षण  का जो रहा उसे बाद में जोडूंगा। अभी  उलझनों के साथ इतना ही। 

Friday, December 9, 2016

ये वक्त

                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                किस तरफ जाने दिमाग सोचता है आजकल.  

चुपचाप मेरे बिस्तर पर पड़े -पड़े ऊँघना चाहता  हूँ,

वो जो सामने लगी चे ग्वेरा की तस्वीर है न कमरे की

सोचता हूँ उसको उतारकर रख दूँ कही न दिखने वाली जगह पर,

कमरे के पंखे की धूल गर्मी आने पर हटा ही दूंगा गर्मी आने पर,

और कमरे में जो दो जालें  है उनमे नही दिख रही मकड़ी,

चुपचाप पसरा होने पर भी ,होते हुई कई चीजों को अनदेखा करके,

कुछ ठीक होते हुए की गुंजाइश में  रहना चाहता हूँ,

 कह देने के भाव से अब मैं विस्मृत होना चाहता हूँ,

ये जो मोर्डन आर्ट सरीखी कविता बन रही है,

ये मेरे द्वारा अपने आपको न समझे जाने का प्रस्ताव है,

 भावशून्य, यही चाहते है न आप सब मुझमें.












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