अभी मेट्रो से आ रहा था। एक दपन्ति जिनकी उम्र 20 से 25 के बीच रही होगी। उनके दो बच्चे थे। जिनमें डेढ़ या दो साल का अंतर रहा होगा। मेट्रो में मेरी सााइड वाली सीट पर बैठे थे। क्योंकि जेंडर का इतना विमर्श पढ़ा है तो मन मे कई सवाल आ रहे थे। सवाल यूँ ही नहीं आ रहे थे वो चेहरे और चेहरे में घुमड़ रहे बादलों के बीच उनकी ज़िंदगी को टटोल रहे थे। पति पत्नी दोनों अपने अपने घरों में बड़े होते हुए, पिताओं के द्वारा ब्याह दिए गए। इतनी जल्दी विवाह के बाद दोनों पर समाज के दवाब रहे होंगे। फिर जवान होते लड़कों में सेक्स की जो समझ बनती है शायद उसमें बच्चे नही होते। लेकिन उसके बाद का परिणाम बच्चे होते है जो उनकी सोची समझी रणनीतिक तैयारी नही माना जाना चाहिए। अब बात ये है कि उन दो को शिशु से बालपन तक के लालन पालन की जिम्मेदारी का दबाव उस माँ पर होगा। इस बीच वो पिता बन चुका अल्हड़ किशोर भी शायद अपने पिता होने के सामाजिक दबावों को महसूस कर रहा होगा। दबाव इसलिए कह रहा हूँ लड़कियों की तरह सामाजिक जिम्मेदारी और दबावों को लेकर वो जन्म होते ही महसूस नही करते। मेट्रो में माँ थकान के साथ बैठी है। एक बच्चा प्लास्...
ये 31 दिसम्बर की पोस्ट है जिसे मैं आज पूरा कर रहा हूँ।उस दिन का पूरा समय साल को विदाई देने में बिता। ये कोई निश्चित नही था की मैं इस दिन को ऐसे ही बिताने वाला था।साल को विदाई देने का निश्चय एक तोरण खरीदने को लेकर हुआ। इस उम्र में मैं और मेरे जैसे कई अपना दिन बचाने को निरंतर लगे रहते है। लेकिन दिल्ली की इस भीड़ में मेरे बुद्धिजीवी टाइप दोस्त शुद्ध ऑक्सीजन है। कल जब हम यूनिवर्सिटी के करीब वाले बाज़ार में तोरण ढूढनें निकले तो दिमाग में कोई और पोस्ट थी जो लिखनी थी। पर घूमते हुए एक दोस्त ने अपनी भावनात्मक बात रख दी। (देखो अब पोस्ट बदल गयी साहित्यिक होने ज़्यादा मैं यह छीछालेदर लिखने वाला हूँ।) वैसे ये भावना हम देश,समाज बदलने वाले टाइप वाले लोगों में रहती हैं।और हाँ कुछ इलीट बिहेवियर वाले लोगों में भी होती है।मल्टीलेवल पार्किंग की दुहाई देने वाली सरकार की धोखेबाज़ी के नमूने उस मॉल के सामने वाली गली उस दोस्त ने एक पंक्ति चस्पा दी। उसने कही ये इंग्लिश में थी लेकिन हिंदी में बताने की की कोशिश कर रहा हूँ। पंक्ति ये थी की यहाँ दिल्ली यूनिव...
होने की व्याख्या को जब करने की कोशिश कर रहा हूँ तो यह मुझे रोमांचित कर देता है. यह उन दिनों का होना भी है जब भरी गर्मी में अमलतास के फूल पिला रंग बिखेरे हुए होते है. यह उन दिनों का भी होना है जब दूब पर ओस की बूँद शिद्दत से लटकी हुई है. यह उन दिनों का होना भी है जब किसी सर्दी में जमी किसी नदी में पानी बह रहा होता है. यह उन दिनों का होना भी है जब मैं पहाड़ के उपर पहुँच कर हवा को अपने अंदर भर जाने की हद तक महसूस करता हूँ. वैसे दिल्ली में इस समय होना किसी गैस चैम्बर में होने से कम नहीं है. जिसमें मार्किट ने दिल्ली वालों का बता दिया है कि चिंता की कोई बात नहीं है हम आप को बचा ले जाएगे. लेकिन फिर होने को महसूस किस तरह हो ही जाता है. यह होना मन का होना है. जिसे मैं सूरते-बेहाल अपनी लूना के साथ महसूस करता हूँ. विश्वविद्यालय से निकलते हुए बंदरों के झुंड के पास उनको चिड़ा कर निकलते हुए. सिविल लाइंस की तरफ जाते हुए उस रास्ते को महसूस करता हुआ कही एक प्याली चाय के साथ ढेर सारी बातों में मैं होता हूँ. थोडा आगे बढ़ते हुए फ्लाईओवर पर चढ़ते हुए दूसरे आसमान में छलांग लगाते हुए मैं ह...
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