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शहर का दिया

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हमनें शहरों को ट्यूबलाइट से भर लिया वक़्त ने शहर से धीरे धीरेआसमां के तारे खोये, शहरों ने हमारे दिन रात हम लोगों से छीने तब से नींद में मिलते है एक-दूसरे से लोग,     शहर ने बिना धूल वाले कंक्रीट के रास्तें दिए शायद ही हमें कोई पगडण्डी मिली हो शहर में, शहरों ने जगह दी रहने को, हमें लोग दिए सुना है गाँव में बहुतेरे घर खाली पड़े है अब, शहरों ने हमें तरीके दिए कई जीने के फिर हम भूलने लग गए एक दूसरे को, शहर ने हमें दुनिया में काम करना सिखाया इंसानियत को भूलकर हमनें ये काम सीख लिये कभी शहर मेरे लिए सपना सरीखे थे फिर भी गाँव ही लौट जाना चाहता हूँ,

सवाल पूछना है

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कई दिनों से  एक सवाल सामने रहता है। लेकिन इसको पूछा क्यों जाए? और न पूछना भी तो सवाल के साथ जीना दुश्वार कर देता है।अगर जवाब के घर का पता  होता तो अपने सवाल को चीठ्ठी के जरिये जरूर पंहुचा देता। लेकिन ऐसे थोड़े होता हैं जवाब की एक दुनिया होगी। फिर मैं क्यों उस जवाब को अपने सवाल के इल्म की दुहाई दू। ये भी तो है इस सवाल के साथ बहुत कुछ कहना था फिर सवाल और फिर कहना दोनों नहीं हो पाता। सवाल के साथ मैं लाइब्रेरी में घंटो बिताता भी हूँ तो भी सूरत-ऐ -हाल वही रहता। जबाब परेशान है इसलिए तंग करना भी ठीक नही पर कोई बात चले तो जा पहुचे गी  ग़ालिब की हवेली तक। वैसे भी आजकल कोई बैठकर शांति से बात कहा करता है। ये सवाल शायद मेरा कृष्णा सोबती की ऐ लड़की से है जो अभी पढ़नी बाकी है। यु भी सवाल के बहाने लिखना हो गया। वरना आजकल बस सोचना ही हो रहा है लिखना नहीं हो पा रहा।

वो अँधेरी दुनिया चाहते है

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वो लड़ रहे है वो झगड़ रहे है  ये करना उनकी दिनचर्या का हिस्सा भी नहीं होगा  फिर भी वो लड़-झगड़ रहे है    क्यूँ वो एक दूसरे को अपनी पहचान देना चाहते है  जब उनकी जीभ का स्वाद अलग है  जब उनकों स्पंदन भी अपनी तरह का महसूस होता है  जब सब कुछ वो अपनी तरह का करना चाहते है  तो  शायद उन्हें पता होगा की दुनिया में रंग है  अब उन्होंने क्यों इस दुनिया बैरंग करना चाहते है अनंत बिंदु से इस दुनिया ने अपने को सबके हिस्से का गढ़ा है  फिर वो क्यूँ  चाह रहे है की सब उन/उस जैसे हो जाए  आखिर अपने स्वार्थों की खानापूर्ति का ये खेल क्यूँ   उन्हें सब रंगों को मानना होगा वरना एक दिन सिर्फ अँधेरा होगा घोर अँधेरा  फिर शायद खुश हो जाए  मिट जाएगी इंसानी पहचाने पहचानने के लिए सिर्फ बचा रह जायेगा अंधेरा  

माफीनामा बायीं तरफ दर्ज है

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पूरा दिन यूँ ही निकल जाता है। सामने कई किताबें बिखरी है। क्रांति अब मेरे लिए मूकदर्शक है। पढ़ना जैसे कमरे में लगा मकड़ी का जाला हो गया है जिस पर धुल जम चुकी है। आजकल अपने पीछे एक ही समय में दो हाथों के सहारे अपने कान और आँखे बंद करके खड़ा हूँ।क्या पगडंडी तुम्हारी बनाई हुई है ? इस पर चलुंगा तो मुझे पता है तुमने चलने के लिए पक्की गली चुनी है। अपने में लौटने का इंतजार कर रहा वो शख़्स सिर्फ एक मूर्ति है जिसे इतिहासकार किसी संग्रहालय में ढूंढ के रखेंगे। पता नही उसे वो देख पाएंगे जिनके लिए वो आशान्वित है की एक दिन उसे वो देखेंगे। कुछ दिन के लिए समय हम में बीतना चाहता था तो फिर बीत गया तो उसकी स्मृति रेखाएँ भी हाथ में नही पढ़नी चाहिए। वैसे समंदर किनारे रेत में लेट जाने का मन होता है जब ज्वार चढ़ेगा तो मैं उसमे उतर जाऊंगा। फिर अनंतकाल तक उस मछली की आँखों में झाँकूँगा जिसमे इंसानी दुनिया नहीं होगी। भूगोल का छात्र होते हुए भी कहना चाहता हूँ की मैं पृथ्वी के किनारे -किनारे चलना चाहता हूँ। चलना भी एक रवायत है समंदर से लहरे लगातार चल कर आती है और किनारे पर आकर टूट जाती ...

शहर में क्या होंगे हम तुम

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चलों न साथ साथ चलते है इन सड़कों पर  इस शहर में एक दूसरे को ढूंढेगे हम दोनों हो जाएंगे बस स्टैण्ड का इंतजार किसी खाली बस में घर तक पहुंचेंगे  हम उस पानी वाले का पानी हो जाएंगे  जो ठण्डा रहता है घंटों और प्यास किसी की बुझाता है  हम किसी रिक्शा खींचने वाले का पसीना बनकर बहेंगे  जो शाम को ढ़ाबे पर रोटी के स्वाद बदलता है  हम यूनिवर्सिटी की वो बेस्वाद चाय हो जाएंगे जिस को दिल्लगी के चलते पीते है  तुम कमला नगर हो शायद और मैं मुखर्जी नगर तुमसे दिल नहीं भरता और मैं वहा ठहरा हूँ कई सालों से         देखो  शहर रोज बदल रहा है.........   संदीप 'विहान'

और मेरा पहला साल

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दिल्ली में अपनी अलग सी पहचान लिए हुए एक इमारत ने 1948 से अब तक बहुत कुछ गढ़ा है। इस इमारत की खास बात यह है की इसकी ईटे वही से नजर आनी शुरू हो जाती है जहाँ से धरती की सतह शुरू होती है ।मतलब इसकी मजबूती  जमीं से जुडी  है। ये इमारत बड़ी प्रखर है, बातूनी है, लड़ती है, झगड़ती है, मचलती है, सँवरती है और भी न जाने क्या क्या । यह इमारत जीती जागती स्त्री है ।इस इमारत का नाम मिरांडा हाउस है। यहाँ एक साल हो गया। अच्छा लगता है लड़कियाँ दुनिया रच रही है। जिन को आदमी द्वारा दुनिया आगे बढ़ाने का मुगालता है वो अपने पास रखिये। पिछले साल की जनवरी को याद करता हूँ  तो याद आता है की दो औरतों को पढ़ते-पढ़ते मैं उनकी दुनिया में पहुँच जाऊँगा, इस को सोचना बहुत रूमानी है। एक उमा चक्रवर्ती हैं, जिनकी किताब 'जाति में पितृसत्ता' उस दौरान पढ़ के खत्म ही की थी और दूसरी प्रेम चौधरी जिन्होंने 'घूंघट वाली औरतों' की दुनिया को समझाया। वैसे सोचता हूँ मनु भंडारी ने इसी कॉलेज में 'नई नौकरी' कहानी ताना-बाना बुना होगा। नंदिता दास ने इसी कॉलेज में अभिनय के कुछ...

विकास का रंगमंच

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''  मैं सोचने पर मजबूर की हम सब क्या अच्छे और बुरे पीआर के शिकार भर है ? '' इस पंक्ति के जरिये घर से लेकर बाहर तक जो हो रहा है ,या फिर देश से विदेश तक जो हो रहा है उसे देखने की  कोशिश कर रहा हूँ। लेकिन शांत रहने की कवायद में मैं निर्जीव होता जा रहा हूँ। लेकिन निर्विकार नही हो सकता ,क्यूंकि हाड़-माँस का बना हुआ जीव हूँ और वैज्ञानिक भाषा में इस हाड़ माँस के पुतले को होमो सॅपिएन्स कहते है। मैं चाहता हूँ की मैं भी निर्विकार होकर रहने का दैवत्व प्राप्त करू। फिर इसमें भी तो डर हैं की इसी निर्विकार के चलते सभी लड़ाइयाँ और शांति अपने स्थापित मूल्यों में पहुँची हैं जिसे  ईश्वर कहते है। अगर मैं सोचूँ और अपने को इस मैट्रिक्स से बाहर निकालूँ तो मैं घृणा विहीन या स्पन्दनहीन दुनिया की कल्पना करुगाँ। जिसमें जो हो रहा हो उसका आरोप दूसरे पर ना मढ़े।  खालसा से मेरे कमरे तक रस्ता इस शहर के बारे में सोचने को मजबूर कर देता है।मुझे तो ये ही समझ नही आता की कर क्या रहे हैं ? हम अपने साथ !!! और जो कर रहे हैं उसमे स्त्री और पुरुष बराबर के ...